Shashi Tharoor Backs Rahul Gandhi: Dikh Rahi Hai Badhati Nazdeekiyan
Shashi Tharoor Backs Rahul Gandhi: Dikh Rahi Hai Badhati Nazdeekiyan
जब राहुल गांधी सोमवार को लोकसभा में बोलने के लिए खड़े हुए, तो उनके हाथ में एक प्रिंटेड मैगज़ीन आर्टिकल था, जिसमें उन्होंने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की एक अप्रकाशित (अनपब्लिश्ड) आत्मकथा का ज़िक्र किया। इसके बाद मामला पूरी तरह से संसदीय टकराव में बदल गया और अंततः सदन स्थगित कर दिया गया।
स्थगन के बाद राहुल गांधी के कांग्रेस सहयोगी शशि थरूर सामने आए। संसद के बाहर पत्रकारों से बात करते हुए थरूर ने राहुल गांधी का खुलकर बचाव किया और कहा कि सरकार की प्रतिक्रिया ज़रूरत से ज़्यादा थी।
थरूर ने कहा, “उन्हें अपनी बात रखने का मौका ही नहीं मिला।” उन्होंने स्पष्ट किया कि उस लेख में सेना या सैनिकों को कहीं भी दोषी नहीं ठहराया गया है। मुद्दा उन फैसलों का था जो केंद्र सरकार ने लिए या नहीं लिए। थरूर के अनुसार, राहुल गांधी भी यही सवाल उठाना चाहते थे और सरकार को इस पर अति-प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए थी।
विवाद की शुरुआत
यह विवाद तब शुरू हुआ जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी ने पूर्वी लद्दाख में 2020 के भारत-चीन सैन्य गतिरोध से जुड़े सवाल उठाने की कोशिश की। उन्होंने अपनी बात एक प्रकाशित मैगज़ीन लेख के संदर्भ से शुरू की, जो जनरल एम.एम. नरवणे की अभी तक जारी न हुई आत्मकथा पर आधारित था, जिसमें उस संकट के दौरान लिए गए फैसलों पर चर्चा की गई थी।
इस संदर्भ पर सत्तापक्ष की बेंचों से तुरंत आपत्ति जताई गई। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी के अप्रकाशित पुस्तक से उद्धरण देने के अधिकार पर सवाल उठाया।
विवादित संदर्भ
पूरा विवाद राहुल गांधी द्वारा एक मैगज़ीन में प्रकाशित लेख का उल्लेख करने को लेकर था, जो जनरल नरवणे की आने वाली आत्मकथा “फोर स्टार्स ऑफ़ डेस्टिनी” पर आधारित था। बताया जाता है कि यह किताब 2020 के पूर्वी लद्दाख गतिरोध की परिस्थितियों को उजागर करती है, जो मई की शुरुआत में हुई एक हिंसक झड़प के बाद सामने आई थीं। पैंगोंग झील क्षेत्र में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच टकराव हुआ था, जो बाद में दशकों का सबसे गंभीर सैन्य संकट बन गया।
वरिष्ठ मंत्रियों का तर्क था कि किसी अप्रकाशित आत्मकथा से उद्धरण देना गलत और भ्रामक है। वहीं विपक्षी नेताओं का कहना था कि राहुल गांधी जिस सामग्री का ज़िक्र करना चाहते थे, वह पहले से ही सार्वजनिक क्षेत्र (पब्लिक डोमेन) में मौजूद थी, क्योंकि वह लेख आसानी से उपलब्ध था।
राहुल गांधी ने मैगज़ीन का प्रिंटआउट हाथ में लेकर कई बार अपनी बात जारी रखने की कोशिश की, लेकिन उन्हें ऐसा करने से रोक दिया गया।
थरूर का हस्तक्षेप
शशि थरूर ने दोहराया कि उनके अनुसार सरकार को अति-प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए थी और जिस विषय पर राहुल गांधी चर्चा करना चाहते थे, वह पहले से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध था।
उन्होंने कहा, “वह एक प्रकाशित लेख का हवाला दे रहे थे, जिसमें एक ऐसी आत्मकथा से उद्धरण था जो अभी प्रकाशित नहीं हुई है।” थरूर ने कहा कि किताब के अप्रकाशित होने पर आपत्ति जताने के बजाय सरकार को उन्हें बोलने देना चाहिए था।
थरूर के अनुसार, सरकार की इस प्रतिक्रिया के कारण दोपहर में संसद की कार्यवाही बेवजह ठप हो गई। उन्होंने कहा, “मेरे हिसाब से संसद के लिए बेहतर होता कि चर्चा आगे बढ़ने दी जाती। यदि तथ्य गलत हैं, तो सबसे सही तरीका उन्हें सुधारना है, न कि चर्चा को रोकना।”
संसदीय परंपरा का हवाला
अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए थरूर ने संसदीय इतिहास का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जवाहरलाल नेहरू के समय कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत संसद में खुली बहस को अनुमति देना थी।
उन्होंने याद दिलाया कि 1962 के चीन युद्ध के दौरान भी संसद में लंबी बहसें हुई थीं, जबकि युद्ध जारी था। उन्होंने कहा, “तब कोई व्हिप नहीं था। सरकारी सांसद भी प्रधानमंत्री नेहरू और सरकार की आलोचना कर सकते थे।”
थरूर ने यह भी बताया कि 1965 और 1971 के युद्धों के समय भी संसदीय सत्र आयोजित किए गए थे, जिनमें सांसदों को जानकारी दी गई और देश को भरोसे में लिया गया।
बंद कमरे की बैठक
लोकसभा के स्थगित होने के बाद विपक्षी नेता संसद परिसर में राहुल गांधी के कार्यालय में पहुंचने लगे। इस बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे।
प्रियंका गांधी, जो पहले संसद से चली गई थीं, उन्हें वापस बुलाया गया। कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल भी वहां पहुंचे। सबसे ज़्यादा चर्चा तब हुई जब शशि थरूर बैठक में शामिल होने के लिए राहुल गांधी के कमरे में पहुंचे।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, यह बैठक करीब 40 मिनट तक चली। इसमें राहुल गांधी, खड़गे और थरूर शामिल थे, और बाद में लोकसभा में कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई भी इसमें शामिल हुए।
यह पहली बार था जब थरूर इस तरह की बैठक का हिस्सा बने। पिछले सप्ताह राहुल गांधी, खड़गे और थरूर के बीच एक अलग बैठक हुई थी, लेकिन उसके बाद राहुल गांधी और थरूर की कोई सीधी बैठक नहीं हुई थी। इससे पार्टी के भीतर नेतृत्व और केरल में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर अटकलें तेज़ हो गई थीं।
रिश्तों में नरमी
कांग्रेस के अंदरूनी हलकों में सोमवार की घटनाओं को इस बात के संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि राहुल गांधी और शशि थरूर के बीच की कथित कड़वाहट अब कम हो रही है। कई पार्टी नेताओं को आपस में बातचीत करते हुए देखा गया, जहाँ थरूर के सार्वजनिक रुख में आए बदलाव पर चर्चा हो रही थी।
अब तक शशि थरूर को पार्टी के भीतर एक स्वतंत्र सोच वाले और कभी-कभी सतर्क नेता के रूप में देखा जाता रहा है, जो सीधे टकराव से बचते थे। लेकिन राहुल गांधी का उनका खुला समर्थन, चाहे सार्वजनिक बयान हों या बंद कमरे की बैठक में उनकी मौजूदगी — दोनों ही एक स्पष्ट बदलाव का संकेत देते हैं।
