Why Men and Women Are Quitting Gym Machines: The Rapid Rise of Functional Fitness
आजकल अगर आप किसी भी जिम में जाएं, तो एक साफ़ बदलाव दिखता है। पहले जहाँ लोग ज़्यादातर ट्रेडमिल, एलिप्टिकल या भारी-भरकम मशीनों पर एक्सरसाइज़ करते थे, अब वहाँ लोग अलग तरह से मूव करते नज़र आते हैं। केटलबेल झूलते हैं, मेडिसिन बॉल ज़मीन पर पटकते हैं, और लोग शरीर को मोड़ते, झुकते, स्क्वैट और लंज करते दिखते हैं—बिल्कुल वैसे जैसे हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में करते हैं।
इसी को कहा जाता है फंक्शनल फिटनेस।
फंक्शनल फिटनेस क्या है?
CK बिरला हॉस्पिटल्स, CMRI के ऑर्थोपेडिक्स विभाग के डायरेक्टर डॉ. राकेश राजपूत बताते हैं कि फंक्शनल फिटनेस का मकसद शरीर को रोज़मर्रा के कामों के लिए मज़बूत और सुरक्षित बनाना है।
इसमें ऐसी एक्सरसाइज़ होती हैं जिनमें शरीर के कई हिस्से एक साथ काम करते हैं—जैसे बैठना-उठना (स्क्वैट), धक्का देना, खींचना, घूमना और वजन उठाना। ये एक्सरसाइज़ असली ज़िंदगी की हरकतों जैसी होती हैं, जिससे संतुलन, लचीलापन, तालमेल और जोड़ों की मजबूती बेहतर होती है। इसका लक्ष्य सिर्फ़ शरीर दिखाना नहीं, बल्कि शरीर को काम के लायक बनाना है।
लोग मशीनों से दूर क्यों जा रहे हैं?
जिम की मशीनें अक्सर शरीर को एक ही दिशा में मूव करवाती हैं। आप बैठकर बस पुश या पुल करते हैं, और शरीर के बाकी हिस्से ज़्यादा एक्टिव नहीं होते।
वहीं फंक्शनल फिटनेस में पूरा शरीर साथ काम करता है। कोर मसल्स एक्टिव रहती हैं, हाथ-पैर मिलकर मूव करते हैं और बैलेंस भी बनाना पड़ता है। एक्सरसाइज़ थकाने वाली होती है, लेकिन करने के बाद एक अलग ही संतुष्टि मिलती है—जैसे कुछ सच में काम का किया हो।
क्या फंक्शनल फिटनेस वजन घटाने और मसल बनाने में असरदार है?
डॉ. राजपूत कहते हैं कि फंक्शनल ट्रेनिंग असरदार होती है, लेकिन मशीनों की तरह नहीं। इसमें एक साथ कई मसल्स काम करती हैं, जिससे ज़्यादा एनर्जी खर्च होती है। मशीनें खास मसल्स को टारगेट करने में मदद करती हैं, जबकि फंक्शनल फिटनेस मूवमेंट और सहनशक्ति बढ़ाती है।
शुरुआत में मसल्स का फर्क ज़्यादा नज़र नहीं आता, लेकिन स्टैमिना, कंट्रोल और ताकत में सुधार जल्दी महसूस होता है। ये ताकत रोज़मर्रा के कामों में ज़्यादा काम आती है।
क्या हर उम्र के लोग फंक्शनल फिटनेस कर सकते हैं?
इसकी कोई तय उम्र नहीं है। असली बात यह है कि आपकी सेहत कैसी है और पहले आप कितने एक्टिव रहे हैं। जो लोग लंबे समय से एक्सरसाइज़ नहीं कर रहे या जिन्हें कोई मेडिकल प्रॉब्लम है, उन्हें धीरे-धीरे शुरुआत करनी चाहिए। सही तकनीक और धीरे-धीरे प्रोग्रेस बहुत ज़रूरी है।
क्या पीठ, घुटने या जोड़ों की समस्या वाले लोग यह कर सकते हैं?
अक्सर हाँ। जोड़ों के आसपास की मसल्स को मज़बूत करने से सपोर्ट बेहतर होता है। लेकिन एक्सरसाइज़ जल्दी-जल्दी या बिना निगरानी के करने से परेशानी हो सकती है। ऐसे लोगों को हल्की एक्सरसाइज़, सही पोस्चर, धीमी स्पीड और कोर पर ध्यान देना चाहिए। एक्सपर्ट की गाइडेंस बहुत मदद करती है।
सबसे आम गलतियाँ कौन-सी होती हैं?
सबसे बड़ी गलती है—जल्दीबाज़ी। लोग बेसिक ताकत और फ्लेक्सिबिलिटी बनाए बिना मुश्किल मूवमेंट करने लगते हैं। वार्म-अप छोड़ देते हैं, सही पोज़िशन पर ध्यान नहीं देते और स्पीड पर फोकस करते हैं। इससे चोट का खतरा बढ़ जाता है।
फंक्शनल फिटनेस धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाली ट्रेनिंग है, इसमें सब्र ज़रूरी है।
आज लोग सिर्फ़ एक्सरसाइज़ करने के लिए एक्सरसाइज़ नहीं करना चाहते। वे ऐसी ताकत चाहते हैं जो ज़िंदगी में काम आए। ऐसी वर्कआउट जो दिमाग और शरीर दोनों को एक्टिव करे और एक्सरसाइज़ के बाद थकान के साथ आत्मविश्वास भी दे।
यही वजह है कि लोग फंक्शनल फिटनेस की ओर बढ़ रहे हैं।
